यह कैसा लोकतंत्रिक देश है जहां लाशों के ढेर पर राजनीति हो रही है।माफ कीजियेगा साहब, शब्द कड़वे है लेकिन देश की सच्चाई यही है। जो लोग अच्छे दिनों में लोगों को कुछ तोहफा देकर अपने आपको समाज का ठेकेदार बताते हुए लोगों की मदद करने की बातें करते थे। वे लोग आजकल कहीं नजर नहीं आते हैं। क्योंकि आज सही में किसी को मदद करना पड़ सकता है।हजारों लाखों लोगों को मदद की जरूरत भी है और ऐसे में वे जब मदद करने के लिए आगे बढ़ेंगे तो मदद पाने वालों की संख्या शायद उनके मदद करने की अपेक्षा से ज्यादा होगी और ऐसे में उन की तस्वीर मीडिया में कैसे आएगी।उनको तो अपने मीडिया में तस्वीरें आने से मतलब है।उनका मदद करने से मतलब बस यही है कि अखबारों में उनकी बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपे और यह लिखा जाए की इस सज्जन व्यक्ति ने दरियादिली दिखाते हुए 200 ग्राम प्याज और आधा किलो आलू के साथ एक हल्दी पाउडर फलां व्यक्ति को मदद स्वरूप दिया है। जैसे-जैसे कोरोना विकराल रूप हो रहा है। वैसे-वैसे सरकार सहित उन सामाजिक कार्यकर्ताओं की भी पोल धीरे-धीरे खुल रही है। जो लोग ठंडी के मौसम में ऐसे कंबल का वितरण करते थे जिन्हें गर्मी के दिन में ओढ़ने के बाद भी गर्मी नहीं लगेगी।जनता मन ही मन अपने नेताओं एवं समाजिक कार्यकर्ताओं के चरित्र और चित्रण का मूल्यांकन कर रही है। यह बातें काफी कड़वी लगेगी क्योंकि उनके अंतरात्मा पर इन बातों से चोट पहुंच सकती है। लेकिन यह कड़वा सच है कि जो लोग अपने फोटो खिंचवा कर सामाजिक कार्यकर्ता बनते थे आज वह अपने आप को बचाने की कोशिश में किसी घर के कोने में दुबके पड़े हैं।आज किसी को किसी की या यूं कहें जनता की कोई फिक्र नहीं है। सबको आज अपनी ही जिंदगी की पड़ी है। आज की परिस्थिति को देखकर किसी कवि के लिखे हुए दोहे याद आते हैं कि^ स्वार्थ बस होई प्रीति^,इस समय मे यह दोहा चरितार्थ होते नजर आ रहा है।
आज भी कुछ लोग वैसे सज्जन को बेवजह भगवान का दर्जा दे रहे हैं और उनके चेहरे को चमकाने को लेकर दिन रात अपने कलम से मेहनत कर एक चमचागिरी का हद पार कर रहे हैं। इस विकट परिस्थिति में मदद के नाम पर भी लोग मदद करने के बजाय एक दूसरे का दोषारोपण करते हुए नजर आ रहे हैं।जनता को पुलिस ऐसे पीट रही है जैसे जनता ने कोई बड़ा अपराध हो, कहा जाता है कि लॉकडाउन का जनता उल्लंघन कर रही है।घर में रहे तो भूख से मरे और बाहर जाए तो पुलिस का डंडा खाए।सरकार कह रही है कि खाने की व्यवस्था की जा रही है लेकिन वह खाने की व्यवस्था कहां है ,शायद ही किसी को मालूम हो। कुछ काम तो कागजों पर इस तरह हो रहा है जैसे मानो वह सुनामी लहर की तरह लोगों को मदद पहुंचाया जा रहा हो । लेकिन जब धरातल पर आइए तो स्थिति यह है कि यहां पर तो किसी को कोई पूछने वाला तक नहीं है।दवा के बिन रोगी तड़प रहे,बेड के बिन मरीज नीचे छटपटा रहे हैं,कोई ऑक्सीजन ऑक्सीजन चीला रहा है,तो कोई दवा के बिना ही प्राण त्याग रहा है। शव ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं तो ठेला पर ही शव को लाद कर अपने परिजनों को श्मसान घाट पहुंचा रहे है।स्थिति यह है कि अब शवों को जलाने के लिए भी सीमा रेखाओं की बातें हो रही है,और हमारे देश के नेता एसी में बैठ कर डिबेट डिबेट खेल रहे हैं। जिस जनता ने उन्हें चुनकर अपना प्रतिनिधि बनाया उस जनता की फिक्र नहीं बस उन्हें फिक्र है तो विपक्ष और पक्ष के बीच में कौन सा मुद्दा उछाला जाए ,और घंटों उस पर अपना गला फाड़ फाड़ के अपनी आवाज को ऊंचा कर दूसरे के आवाज को दबाया जाए।क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है, जहां नेताओं को जनता से सिर्फ चुनाव के वक्त ही नाता रहता है चुनाव बाद जनता मरे या भाड़ मे जाए नेताओं को कोई मतलब नहीं।कुछ हद तक इसकी जिम्मेवार जनता भी है जो वोट के वक्त जात पात और धर्म के नाम पर वोट करती हैं लेकिन आपदा को जातपात और धर्म से मतलब नहीं होता वह सबको एक समान देखती हैं. इसलिए आज भारत लाशों के ढेर पर खड़ा है और जनता से वास्तविक आकडे छुपाए जा रहे हैं।

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