
कवियों के काव्य-पाठसे साहित्यिक पुनर्जागरण का दिया संदेश
अंगवस्त्रम से सम्मानित हुए साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी
सोनपुर।"यह काल- दण्ड यह धर्म- दण्ड यह आर्य भूमि हमारी है।यह धर्म चक्र यह समय चक्र यह भारत भूमि हमारी है"- स्थानीय कवियों ने विविध विषयों पर रविवार को सुमधुर काव्य पाठ एवं समसामयिक परिचर्चा के साथ सोनपुर की धरती पर साहित्यिक पुनर्जागरण का संदेश दिया। इस मौके पर वरिष्ठ वामपंथी चिंतक ब्रज किशोर शर्मा ने साहित्यकार व चिंतक सुरेन्द्र मानपुरी को अंगवस्त्रम से सम्मानित किया।
यहां सोनपुर प्रखंड के रजिस्ट्री बाजार स्थित दुर्गा स्थान परिसर में रविवार को समसामयिक विषयों पर परिचर्चा एवं कवि गोष्ठी में साहित्यकार अवध किशोर शर्मा ने अपनी कई लघु रचनाओं को अपने मुखारबिंद से दर्शकों के समक्ष परोसा। कवि गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक सुरेन्द्र मानपुरी ने की। संचालन वरीय साहित्यकार विश्वनाथ सिंह अधिवक्ता कर रहे थे।श्री शर्मा अपनी स्वरचित लघु कविताओं-"तुम्हीं दीनबंधु दिनेश हो सर्वेश हो, विघ्नहर्ता गणाधिपति श्रीगणेश हो हर सांस में है वास तेरी वाणी हो,तुम जगतकल्यानी ब्रह्माणी तू माता अखिलेश्वरी भवानी हो"-से वातावरण में आध्यत्मिक लहर उत्पन्न कर दिया।
श्री शर्मा की पर्यावरण को समर्पित कविता-'जब पथ दर्पण में झांका जबसे मन को मिली निराशा जो चेहरे कल खिलते देखे आज पड़ी रुआंसा"और'बालू के ढ़ेर पर बालू से दबी पड़ी, वह छुई-मुई कुचली मिली सिसकती हुई,कलपती हुई तन पर अनेकों जख्म लिए आकुल -व्याकुल प्यासी मिली"-पर्यावरण पर खतरे की सच्चाई से दर्शक-श्रोता रुबरु हुए।साहित्यकार विश्वनाथ सिंह ने अपनी प्रकाशित रचना-"जन को सुरभित आनंदित कर झर जाते फूल यहां जैसे, मानव मन को आलोकित कर सद महापुरुष चल देते वैसे-काव्य पाठ से पूर्व मुख्यमंत्री स्व. रामसुंदर दास की स्मृति को ताजा कर दिया।कवि मणिभूषण शांडिल्य ने"बनना है तो बनों अघोरी माया मोह को त्यागो अब तुम"का काव्य पाठ कर अलख निरंजन के प्रति अपनी समर्पण की भावना प्रदर्शित की।
वरिष्ठ वामपंथी चिंतक ब्रज किशोर शर्मा ने परिचर्चा में वैश्विक युद्ध और धार्मिक उन्माद से सतत सावधान रहने और उससे बचने के लिए वैश्विक समुदाय को आगाह करते हुए उससे बचाव के लिए प्रयास करने का भावपूर्ण आग्रह किया।जबकि साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी ने चर्चाओं के प्रसंग में कहा कि संस्कृत शास्त्रों में ईश्वर की परिकल्पना है उसे ही तुलसीदास जी ने आत्मसात कर अपने काव्य में स्थान दिया।उन्होंने श्वास को मनुष्य के अस्तित्व का मूल अंश बताते हुए कहा कि सांस नहीं तो व्यक्ति नहीं।शिक्षाविद मनोरंजन कुमार सिंह ने व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की जरुरत है।परिचर्चा में विश्वनाथ सिंह, शंकर सिंह, अवध किशोर शर्मा,अभय कुमार सिंह,मणिभूषण शांडिल्य,गगन सिंह ने भी भाग लिया।
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